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एक औरत की कहानी



एक औरत की कहानी 

 दोस्तों एक औरत कभी भी खुश नहीं रह पाती क्युकी जब वह जन्म देती  है किसी लड़की को तो उसे समाज कहता है की एक लड़का नहीं पैदा कर पाई वंश कैसे चलाएगी और ये समाज शिर्फ़ हम औरतों के बारे में इतना ही जनता है की एक बेटी वंश आगे नहीं बढ़ा सकती वह इस बात  से अनजान है की  वंश कोई एक आगे नहीं बढ़ा  सकता जब तक लड़की नहीं होगी वंश आगे बढ़ ही नहीं सकता .
इस समाज के दो पहलू होतें हैं एक आदमी और एक औरत हम सभी के जिंदगी में लड़का और लड़की का बराबर का योगदान होता है किसी एक के भरोसे जिंदगी नहीं चलती और इस समाज को लड़का और लड़की दोनों  की जरूरत है किसी एक की नहीं लेकिन हमारे पूर्वजो ने रिवाज ही बना दिया है की एक लड़की बाहर काम नहीं कर सकती बाहर पढ़ नहीं सकती उसे बहर मत भेजो उसके साथ गलत होगा 


दोस्तों हमारे पूर्वजों ने तो घूंघट को भी संस्कार का नाम दे दिया पर क्या ये संही है नही जो सिखाना चाहिए वो तो बता नहीं पाते हैं दोस्तों हमारे समाज में एक लड़की को पूरी तरह से गिरा देते और उसे विस्वास भी दिला देते हैं की वो कुछ नहीं कर सकती और इसी को संस्कार का नाम दे देते हैं पर क्या ये हमारे समाज के लिए संही है' नहीं दोस्तों हम अपने आने वाली पीढी को भी बर्बाद कर देते है इन्ही सोचों की वजह से अगर आज औरत घर में आपके लिए खाना बना रही है तो उसकी ये मजबूरी नहीं है वो भी बहुत कुछ कर सकती है बशर्ते आप उसे साहस तो दें .

जब तक आप उसे सहस नहीं देंगे वो कुछ भी करने को तैयार नहीं होगी क्युकी बचपन से लेकर उसे उसके माता -पिता ने वही सिखाया जो उन्हें मिला और हमारे पूर्वज अपनी मनमर्जियों को संस्कार का नाम दे गये कितनी अजीब बाट है न हम अपनी सोच अपनी जिंदगी छोड़ कर आज भी उनकी जिंदगी जी रहे हैं क्या ये सही है, दोस्तों नहीं हमें अपनी सोच बदलनी होगी हमें अपनी जिंदगी जीनी चाहिए हमारे पूर्वज मर गये मर कर चले गये हमारे लिए क्या अच्छा कर गये कुछ भी नहीं बस अपनी आशांए छोड़ गये क्या कर पाए कुछ भी नहीं .
आप सभी ने एक शब्द तो सुना ही होगा एकता में बल होता हैं पर क्या कोई जनता की असल में एकता किसे कहते हैं ये हम सभी जानते हैं की एकता में बल होता है और हम सभी को एक साथ रहना चाहिए लेकिन कोई ये नहीं जानता की हम दोनों ही समाज का हिस्सा है और हम दोनों के बैगैर समाज अधूरा है .

जब तक लड़का- लड़की का और लड़की- लड़के का साथ नहीं देती तब तक हम दोनों ही अधूरे हैं हम दोनों को हक है अपनी जिंदगी जीने का और अपना फैसला लेने का ,अगर घर से निकलना जुर्म है अपने हक के लिए लड़ना जुर्म है तो रानी लक्ष्मीबाई अहिल्याबाई ये सब जुरमी है 
असल जिंदगी में कोई भी हमेशा खुश नहीं रहता कोई न कोई समस्याए तो हम सभी की जिंदगी में होती हैं तो अगर सच में अपने बच्चों को संस्कार देना चाहते हैं उन्हें आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें उनके हक के लिए लड़ना सिखाइए उन्हें झूठ और सच को पहचानना सिखाइए उन्हें झूठ और सच के लिए लड़ना सिखाइए उन्हें प्रोत्शाहित करिए 

अगर आपका बच्चा हार भी जाता है तो उसे डाटने धमकाने से अच्छा है उसे जितना सिखाये जब एक बच्चा मैदान में दौड़ता है तो बहुत आस लेकर दौड़ता है की वो जीत कर आएगा लेकिन जब वो किसी कारण वश हार भी जाता है और घर आता है तो उसके माता -पिता साहस देने के बजाय   ये कहते हैं की वो ये कर ही नहीं सकता अब समय बर्बाद न करे पर कोई ये नहीं सोचता की क्या वो भी यही चाहता है जब कोई हारता है तो एक बार तो जरुर दिमाग में नकारात्मक सोच आती है अगर उस टाइम पर हमें कोई साहस देने वाला नहीं होता है तो हम हार मान लेते हैं क्युकी उस टाइम वह पूरी तरह से टूट चूका होता है इसलिए वो उस समय वही सुनता है जो लोग बोलते हैं तो ऐसे मुस्किल समय में अगर आप अपने बच्चे का साहस नहीं बढ़ा सकते तो उसे अपनी नकारात्मक सोच भी बच्चों पर न थोपे '

तो हम सभी को जिंदगी मिली है उसका सम्मान करे एक -दूसरे का सम्मान करे हम दोनों ही समाज का हिस्सा है और और दोनों ही समाज की सोच और इस परम्परा को बदल सकते हैं और एक और हम दोनों ही एक दुसरे के बैगैर अधूरे हैं तो जिंदगी को खुल कर जियें और अपने हिसाब से जिए दूसरों के सोच के हिसाब से नहीं क्युकी हम सभी अभी जिंदा हैं 
दूसरों के भरोशे तो मुर्दे उठा करते हैं हम सब तो फिर भी अभी जिंदा हैं 
तो समाज में औरत और पुरुष दोनों का सम्मान करे दोनों ही पूज्यनीय हैं 
 तेरे चहरे की हँसी हूँ मै 
तेरे चहरे की ख़ुशी हूँ मै 
घर की जिम्मेदारियों का हिस्सा हूँ  
मै जननी हूँ मै दाता हूँ मै 
समाज ने इज्जत न दी तो क्या हुआ 
फक्र है की बेटी हूँ मै